"मुस्लिमो को छोड़ रहे थे, जो हिन्दू था उसका कर रहे थे क़त्ल, मैंने मुस्लिम नाम बताकर बचाई जान"
सितम्बर 2013, स्थान था जम्मू कश्मीर का संभा
ये इलाका जम्मू में पड़ता है, सुबह सुबह 3 मुस्लिम आतंकियों ने संभा जिले के हीरानगर पुलिस स्टेशन पर हमला कर दिया
आतंकी ऑटो में बैठकर आये थे, और उतरते ही उन्होंने ऑटो चालक को कई गोलियां मार कर उसकी हत्या कर दी
आतंकियों ने नारे लगाने शुरू किये "इस्लाम ज़िंदाबाद, पाकिस्तान ज़िंदाबाद"
उसका बाद उन्होंने चुन चुन कर लोगों का क़त्ल कर दिया
हीरानगर पुलिस स्टेशन के बिलकुल सामने, खाने पीने का दूकान चलाते है सोहन लाल वर्मा
सोहन लाल वर्मा उस दिन की सारी चीजें बताते है
आतंकियों ने ऑटो वाले को मारी गोली, जिसके बाद वो पुलिस थाने पर हमला करने चल दिए
ऑटो वाला गिरा हुआ था मैंने उसकी मदद की कोशिश की
इतने में आतंकियों ने मुझे ऐसा करता देख लिया, और बन्दुक की नोक पर पकड़ लिया
आतंकियों ने मुझसे पूछा, तेरा नाम क्या है
मैंने बोलै "मेरा नाम सलीम खान है", फिर आतंकियों ने कहा "तू कहाँ का है"
मैंने कहा, "मैं डोडा जिले का हूँ"
इसके बाद आतंकियों ने कहा, "तू अल्लाह का बंदा है इसलिए तुझे छोड़ रहे है" और इसके बाद आतंकी भाग गए
अगर आतंकियों को पता चलता की मैं सोहन लाल वर्मा हूँ, तो मुझे भी वहीँ गोलियों से भून देते
आतंकी मुस्लिमो को छोड़ रहे थे और हिन्दुओ को मार रहे थे
बांग्लादेश की राजधानी ढाका में भी ऐसा ही हुआ था, जो कुरआन की आयात सूना पा रहे थे, आतंकी उन्हें रेस्त्रां से जाने दे रहे थे, जो कुरआन नहीं सूना पा रहे थे यानि वो मुस्लिम नहीं
तो उसका क़त्ल कर दिया जा रहा था
इतनी घटनाओं के बाबजूद हमारे देश के बुद्धिजीवी बार बार यही दोहराते है की, "आतंक का कोई मजहब नहीं"
Source
ये इलाका जम्मू में पड़ता है, सुबह सुबह 3 मुस्लिम आतंकियों ने संभा जिले के हीरानगर पुलिस स्टेशन पर हमला कर दिया
आतंकी ऑटो में बैठकर आये थे, और उतरते ही उन्होंने ऑटो चालक को कई गोलियां मार कर उसकी हत्या कर दी
आतंकियों ने नारे लगाने शुरू किये "इस्लाम ज़िंदाबाद, पाकिस्तान ज़िंदाबाद"
उसका बाद उन्होंने चुन चुन कर लोगों का क़त्ल कर दिया
हीरानगर पुलिस स्टेशन के बिलकुल सामने, खाने पीने का दूकान चलाते है सोहन लाल वर्मा
सोहन लाल वर्मा उस दिन की सारी चीजें बताते है
आतंकियों ने ऑटो वाले को मारी गोली, जिसके बाद वो पुलिस थाने पर हमला करने चल दिए
ऑटो वाला गिरा हुआ था मैंने उसकी मदद की कोशिश की
इतने में आतंकियों ने मुझे ऐसा करता देख लिया, और बन्दुक की नोक पर पकड़ लिया
आतंकियों ने मुझसे पूछा, तेरा नाम क्या है
मैंने बोलै "मेरा नाम सलीम खान है", फिर आतंकियों ने कहा "तू कहाँ का है"
मैंने कहा, "मैं डोडा जिले का हूँ"
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इसके बाद आतंकियों ने कहा, "तू अल्लाह का बंदा है इसलिए तुझे छोड़ रहे है" और इसके बाद आतंकी भाग गए
अगर आतंकियों को पता चलता की मैं सोहन लाल वर्मा हूँ, तो मुझे भी वहीँ गोलियों से भून देते
आतंकी मुस्लिमो को छोड़ रहे थे और हिन्दुओ को मार रहे थे
बांग्लादेश की राजधानी ढाका में भी ऐसा ही हुआ था, जो कुरआन की आयात सूना पा रहे थे, आतंकी उन्हें रेस्त्रां से जाने दे रहे थे, जो कुरआन नहीं सूना पा रहे थे यानि वो मुस्लिम नहीं
तो उसका क़त्ल कर दिया जा रहा था
इतनी घटनाओं के बाबजूद हमारे देश के बुद्धिजीवी बार बार यही दोहराते है की, "आतंक का कोई मजहब नहीं"
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