राहुल गाँधी और चीन के कनेक्शन का खौफनाक सच आया सामने, खूफिया एजेंसियों के साथ मोदी के भी उड़े होश - Jagran24
चीन के साथ सिक्किम में सीमा विवाद चल रहा है और नोबत यहाँ तक पहुँच चुकी है कि दोनों देशो कि सेनाएं तक आमने सामने खड़ी है. ऐसे नाजुक वक्त में राहुल गाँधी का चीन के राजदूत से चोरी-छिपे मिलने का रहस्य गहराता जा रहा है. मीडिया में अब जो बाते सामने आ रही है, उनपर तो यकीन होता जा रहा है.
दरअसल मीडिया रिपोर्ट्स के मुताबिक़ संदेह जताया जा रहा है कि राहुल की ये मुलाकात कही 2019 के चुनाव के सिलसिले में तो नहीं थी. दरअसल केंद्र में मोदी सरकार आने के बाद से सबसे ज्यादा परेशान कोंग्रेस ही है, जो हर चुनाव हारती चली जा रही है. वही पीएम मोदी की मेक इन इंडिया पोलिसी से चीन सबसे ज्यादा परेशान है क्योकि इसके दमदार भारत दुनिया भर में चीन का विकल्प बनकर उभर रहा है.
कई बड़ी मल्टीनेशनल कंपनियो ने तो चीन की जगह भारत में अपने प्रोडक्शन यूनिट बनाने का फेसला किया है. वही पीएम मोदी के नेत्रित्व में भारत की आसियान देशो और अमेरिका, इसराइल से बढती नजदीकी भी चीन को हजम नहीं हो रही है. ऐसे में दिल्ली के सियासी गलियारों में ये चर्चा गर्म है किम राहुल की चीनी राजदूत से मुलाकात अगले लोकसभा चुनावों को ध्यान में रखकर ही हुई है.
ऐसा मानने के पीछे मुख्य वजह ये भी है कि राहुल ने मुलाकात से पहले विदेश मंत्रालय को ओपचारिक जानकारी तक नहीं दी, जबकि ऐसा करना जरूरी होता है क्योकि राहुल गाँधी विपक्ष के नेता भी है.
कोंग्रेस पार्टी के नेता ने मीडिया से निजी बातचीत के दोरान इस बात की पुष्टि भी की है की राहुल की चीनी राजदूत सेव मुलाकात किसी ओपचारिक या अधिकारिक कार्यक्रम का हिस्सा नहीं था. इसी के चलते दूतावास की और से जानकारी में इस मुलाकात का कारण की नहीं बताया गया. दूतावास की वेबसाइट ने इस मुलाकात की जानकारी पोस्ट कर दी, तब जाकर इसकी पोल खुली.
मोदी की छवि धूमिल करने की साजिश?
बताया जा रहा है की देश की राजनीती में लगातार जमीन खोती जा रही कोंग्रेस ने कुछ ही दिन पहले मोदी सरकार के कामकाज पर एक आंतरिक समीक्षा करवाई थी.
इसमें ये बात सामने आयी की बीजेपी को लगातार मिल रही जीत का सबसे बड़ा कारन जनता के बीच पीएम नरेन्द्र मोदी की छवि है. जनता उन्हें मजबूत और कड़े फेसले लेने वाले भरोसेमंद नेता के तोर पर दिखती है और उनपर विसवास करती है.
आमतौर पर जब देश के प्रधानमंत्री विदेश यात्रा पर होते है तो विपक्ष के नेता ऐसे बयान है लेकिन मोदी को एक कमजोर पीएम के रूप में दिखने के लिए ऐसा दकियानूसी बयान दिया गया.
चीन की मदद मांगने गए थे?
राहुल की मुलाकात के पीछे सवाल ये भी है कि राहुल को इंटरनेशनल डिप्लोमेसी की कोई समझ तो है नहीं. तो फिर वो आखिर वहां करने क्या गए थे? कहीं ऐसे तो नहीं की चीन से मदत मांगी गयी है कि वो देश की किसी छोटे हिस्से पर हमला करके कब्ज़ा कर ले. ताकि कोंग्रेस सड़क से लेकर संसद तक मोदी को आसानी से कमजोर प्रधानमंत्री साबित कर सके.
वेसे बता दे कि इससे पहले एक और बेशर्म कोंग्रेस नेता मणिशंकर अय्यर, मोदी सरकार को हरने के लिए ऐसी ही मदद पाकिस्तान से भी मांग चुका है. भारत में चीन का दूतावास शुरु से ही ऐसी ही भूमिका में रहा है, 1949 और 1962 में कोमुनिस्ट पार्टी सीपीआई की मदद से चीन ऐसी कोशिश कर भी चूका है. ऐसे में यदि मोदी सरकार अगला चुनाव हार जाती है तो इसमें सारा फायदा कोंग्रेस के साथ चीन का भी होगा.
विस्तारवाद के साथ-साथ मेक इन इंडिया के कमजोर पड़ने से चीन की चांदी ही चादी हो जाएगी और कोंग्रेस को सत्ता में आकर अरबो के घोटाले करने का एक और मोका मिल जाएगा
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चुनाव जीतने के लिए देश का सौदा?दरअसल मीडिया रिपोर्ट्स के मुताबिक़ संदेह जताया जा रहा है कि राहुल की ये मुलाकात कही 2019 के चुनाव के सिलसिले में तो नहीं थी. दरअसल केंद्र में मोदी सरकार आने के बाद से सबसे ज्यादा परेशान कोंग्रेस ही है, जो हर चुनाव हारती चली जा रही है. वही पीएम मोदी की मेक इन इंडिया पोलिसी से चीन सबसे ज्यादा परेशान है क्योकि इसके दमदार भारत दुनिया भर में चीन का विकल्प बनकर उभर रहा है.
कई बड़ी मल्टीनेशनल कंपनियो ने तो चीन की जगह भारत में अपने प्रोडक्शन यूनिट बनाने का फेसला किया है. वही पीएम मोदी के नेत्रित्व में भारत की आसियान देशो और अमेरिका, इसराइल से बढती नजदीकी भी चीन को हजम नहीं हो रही है. ऐसे में दिल्ली के सियासी गलियारों में ये चर्चा गर्म है किम राहुल की चीनी राजदूत से मुलाकात अगले लोकसभा चुनावों को ध्यान में रखकर ही हुई है.
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ऐसा मानने के पीछे मुख्य वजह ये भी है कि राहुल ने मुलाकात से पहले विदेश मंत्रालय को ओपचारिक जानकारी तक नहीं दी, जबकि ऐसा करना जरूरी होता है क्योकि राहुल गाँधी विपक्ष के नेता भी है.
कोंग्रेस पार्टी के नेता ने मीडिया से निजी बातचीत के दोरान इस बात की पुष्टि भी की है की राहुल की चीनी राजदूत सेव मुलाकात किसी ओपचारिक या अधिकारिक कार्यक्रम का हिस्सा नहीं था. इसी के चलते दूतावास की और से जानकारी में इस मुलाकात का कारण की नहीं बताया गया. दूतावास की वेबसाइट ने इस मुलाकात की जानकारी पोस्ट कर दी, तब जाकर इसकी पोल खुली.
मोदी की छवि धूमिल करने की साजिश?
बताया जा रहा है की देश की राजनीती में लगातार जमीन खोती जा रही कोंग्रेस ने कुछ ही दिन पहले मोदी सरकार के कामकाज पर एक आंतरिक समीक्षा करवाई थी.
इसमें ये बात सामने आयी की बीजेपी को लगातार मिल रही जीत का सबसे बड़ा कारन जनता के बीच पीएम नरेन्द्र मोदी की छवि है. जनता उन्हें मजबूत और कड़े फेसले लेने वाले भरोसेमंद नेता के तोर पर दिखती है और उनपर विसवास करती है.
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इस रिपोर्ट पर हुई समीक्षा में तय किया है की अगले लोकसभा चुनाव तक सारा फोकस मोदी के ‘मजबूत नेता’ वालो छवि को बिगाड़ने पर होगा. इसी के चलते पीएम मोदी की इजराइल दौरे के दोरान राहुल गाँधी ने बयाँ दिया कि मोदी ने अमेरिका राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रम्प से मुलाकात में वीजा का मसला नहीं उठाया.आमतौर पर जब देश के प्रधानमंत्री विदेश यात्रा पर होते है तो विपक्ष के नेता ऐसे बयान है लेकिन मोदी को एक कमजोर पीएम के रूप में दिखने के लिए ऐसा दकियानूसी बयान दिया गया.
चीन की मदद मांगने गए थे?
राहुल की मुलाकात के पीछे सवाल ये भी है कि राहुल को इंटरनेशनल डिप्लोमेसी की कोई समझ तो है नहीं. तो फिर वो आखिर वहां करने क्या गए थे? कहीं ऐसे तो नहीं की चीन से मदत मांगी गयी है कि वो देश की किसी छोटे हिस्से पर हमला करके कब्ज़ा कर ले. ताकि कोंग्रेस सड़क से लेकर संसद तक मोदी को आसानी से कमजोर प्रधानमंत्री साबित कर सके.
वेसे बता दे कि इससे पहले एक और बेशर्म कोंग्रेस नेता मणिशंकर अय्यर, मोदी सरकार को हरने के लिए ऐसी ही मदद पाकिस्तान से भी मांग चुका है. भारत में चीन का दूतावास शुरु से ही ऐसी ही भूमिका में रहा है, 1949 और 1962 में कोमुनिस्ट पार्टी सीपीआई की मदद से चीन ऐसी कोशिश कर भी चूका है. ऐसे में यदि मोदी सरकार अगला चुनाव हार जाती है तो इसमें सारा फायदा कोंग्रेस के साथ चीन का भी होगा.
विस्तारवाद के साथ-साथ मेक इन इंडिया के कमजोर पड़ने से चीन की चांदी ही चादी हो जाएगी और कोंग्रेस को सत्ता में आकर अरबो के घोटाले करने का एक और मोका मिल जाएगा




