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    इजरायल की किताबों में आज भी पढ़ाए जाते हैं ‘हाइफा’ की जंग में हिन्दुस्तानी बहादुरी के किस्से

    भारतीय नहीं जानते अपने इन सूरमाओं के बारे में
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    भारत के ऐसे अनगिनत ऐतिहासिक चरित्र और घटनाएँ हैं जिनके बारे में भारतीय इतिहास में कहीं कोई विवरण नहीं मिलता है और उनमें से कुछ तो ऐसे हैं जिनके बारे में विश्व के अनेकों देशों में अपनी भावी पीढ़ी को पाठ्य पुस्तकों में पढ़ाया जा रहा है जिस पढ़कर वे प्रेरणा प्राप्त कर सकें और दूसरी ओर हम है जिन्हें अपने ही देश के इस महान इतिहास के बारे में कुछ पता नही, और अगर कहीं कुछ लिखा भी गया है तो बहुत ही कम और उसमें भी काफी कुछ सटीक नहीं है| जिनमें से प्रथम महावीर चक्र विजेता राजेंद्र जामवाल, सारागढ़ी की जंग और प्रथम विश्व युद्ध के दौरान हाइफा युद्ध | ये सभी भारतीय इतिहास की वे गौरवशाली घटनाएँ या चरित्र हैं जिनके बारे में हर भारतवासी को जानकारी होनी चाहिए, मगर अत्यंत आश्चर्य का विषय है कि हम इनके बारे में कुछ नहीं जानते | मगर दोस्तों! आज में आपको भारतीय इतिहास के एक महान अध्याय की ओर लिए चलता हूँ, जहाँ भारत के जांबाज़ सूरमाओं ने महज तलवारों और भालों से ही जर्मनी और तुर्कों की मशीन गनों व आधुनिक हथियारों से लैस सेना को हराकर हाइफा से बाहर खदेड़ दिया था|



    कहाँ है हाइफा और कब लड़ा गया यह युद्ध

    हाइफा वर्तमान में इजराइल का तीसरा सबसे बड़ा शहर है और प्रथम विश्व युद्ध के दौरान जब भारत में अंग्रेजों का शासन था, तत्कालीन शासन द्वारा मित्र राष्ट्रों को ओर से लड़ने के लिए भारतीय सेना हाइफा भेजी गई| उस समय हाइफा पर धुरी राष्ट्र जर्मनी और तुर्की का कब्ज़ा था| विश्व में शांति की स्थापना के लिए सिनाई और फिलिस्तीन के मध्य चलाये जा रहे अभियान के तहत 23 सितम्बर, 1918 को लड़ा गया था|


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    ‘हाइफा के हीरो’ दलपत सिंह शेखावत का परिचय

    अंग्रेज़ शासकों के मैसूर, जोधपुर और हैदराबाद की सेना को युद्ध में भाग लेने वहां भेजा था किन्तु हैदराबाद की सेना में मुस्लिम सैनिक होने के कारण हैदराबाद की सेना को तुर्कों के खिलाफ युद्ध में भाग लेने से रोक दिया और मैसूर व जोधपुर के सैनिकों को युद्ध का आदेश दिया गया|

    इस युद्ध में सेना का नेतृत्व मेजर दलपत सिंह शेखावत और अमन सिंह जोधा ने किया| दलपत सिंह राजस्थान के पाली जिले के देवली पाबूजी के निवासी थे और अपने पिता जागीरदार ठाकुर हरि सिंह के इकलौते पुत्र थे जिन्हें तत्कालीन जोधपुर नरेश ने अध्ययन के लिए ब्रिटेन भेजा था| वे महज 18 वर्ष की आयु में जोधपुर लांसर में घुड़सवार के रूप में शामिल हुए और बाद में वे सेना में मेजर बने |



    हिन्दुस्तानी तलवारों के जौहर समक्ष जर्मनी मशीनगनें हुई नाकाम – तलवार और भालों से लड़े गए आधुनिक विश्व के इस अंतिम और बड़े युद्ध में मेजर दलपत सिंह शेखावत और कैप्टन अमन सिंह जोधा की अगवानी में हिन्दुस्तानी रणबांकुरे घुड़सवार आग उगलती मशीनगनों के ऊपर बिजली बन कर टूट पड़े और सम्पूर्ण विश्व के सामने अदम्य साहस और अकल्पनीय बहादुरी की मिसाल पेश करते हुए महज 1 घंटे में ही तुर्कों और जर्मन सेना को खदेड़ कर हाइफा की 400 वर्ष से अधिक प्राचीन गुलामी का अंत कर दिया | इस युद्ध में मेजर दलपत सिंह सहित भारत के 44 सैनिक शहीद हुए|


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    1300 से अधिक को बंदी बना भारतीय सेना ने इजराइल के राष्ट्र निर्माण का मार्ग प्रशस्त किया

    इस भीषण युद्ध में न केवल भारतीय सेना ने हाइफा को जर्मन और तुर्कों से मुक्त कराया बल्कि साथ ही साथ लगभग 1350 दुश्मन सैनिकों को बंदी बना लिया जिनमें करीब 25 जर्मन ऑफिसर और तुर्कों के 35 ओटोमन ऑफिसर भी शामिल थे| इसके अतिरिक्त तोपखाने की 17 तोपों के साथ अनेकों बंदूकों और मशीनगनों को भी अपने कब्जे में लिया|  इस युद्ध में भारत के 44 सैनिक शहीद हुए| इस विजय ने यहूदियों के लिए एक नए देश इजराइल के निर्माण का मार्ग प्रशस्त किया और 14 मई 1948 को इजराइल के रूप में यहूदियों के एक देश का जन्म हुआ|



    मिलिट्री क्रॉस और इंडियन आर्डर ऑफ़ मेरिट से नवाजे गए दलपत सिंह और अमन सिंह

    मेजर दलपत सिंह सहित अनेक जवान शहीद हुए और लगभग 60 घोड़े इस युद्ध में मारे गए| शहीद होने वालों में दलपत सिंह के अतिरिक्त जोधपुर लांसर के  सवार सुल्तान सिंह,  सवार गोपाल सिंह, मेजर शेरसिंह, सवार शहजाद सिंह और दफादार जोरसिंह प्रमुख थे| मेजर दलपत सिंह को ‘हाइफा के हीरो’ के रूप में ख्याति मिली और उन्हें मरणोपरांत मिलिट्री क्रॉस प्रदान कर सम्मानित किया गया जबकि केप्टन अमन सिंह को इंडियन ऑर्डर ऑफ़ मेरिट तथा आर्डर ऑफ़ ब्रिटिश एम्पायर ए

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