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    सेना के खिलाफ सुप्रीम कोर्ट ने सुनाया हैरतअंगेज फैसला, मोदी समेत भौचक्का रह गए सेना के जवान !

    नई दिल्ली : कश्मीर सुलग रहा है, आये-दिन आतंकी हमले हो रहे हैं और पत्थरबाज आतंकियों को बचाने के लिए सेना पर ही पथराव कर देते हैं लेकिन सेना पैलेट गन चला दे तो देश में बैठे तथाकथित मानवाधिकार संगठन हाय-तौबा मचा देते हैं. अब एक खबर मणिपुर से आ रही है, जहाँ मानवाधिकार संगठन की शिकायत पर माननीय सुप्रीम कोर्ट ने एक बेहद हैरान कर देने वाला फैसला लिया है.


    सेना के खिलाफ सुप्रीम कोर्ट का फैसला !
    दरअसल मणिपुर में उग्रवादियों के आतंक के कारण यहां पिछले कई वर्षों से AFSPA लगा हुआ है. ये बात तो सभी जानते हैं कि देशविरोधी कई ताकतें कश्मीर और मणिपुर से AFSPA को हटाने के लिए पुरजोर कोशिशें कर रही हैं. इसी कोशिश के चलते मानवाधिकार संगठनों ने सेना व् सुरक्षाबलों पर आरोप लगाए कि साल 1979 से 2012 तक सुरक्षाबलों ने मणिपुर में फर्जी मुठभेड़ों में कई लोगों को मारा है, जिनमे नाबलिग और औरतें भी शामिल हैं.

    इसी शिकायत पर सर्वोच्च न्ययालय ने सीबीआई को मणिपुर में सुरक्षा बलों द्वारा 62 कथित फर्जी मुठभेड़ों की जांच करने के निर्देश दिए हैं. न्यायमूर्ति मदन बी. लोकुर की अध्यक्षता वाली पीठ ने सीबीआई के निदेशक से मामले की जांच के लिए दो सप्ताह के अंदर टीम गठित करने को कहा है. साथ ही सुप्रीम कोर्ट ने इस मामले में सीबीआई को 28 जनवरी तक अनुपालन रिपोर्ट सौंपने को भी कहा है.

    2010 -12 में मानवाधिकार संगठन “एक्स्ट्रा जुडिशियल विक्टिम फैमिली एसोसिएशन” ने लगभग 1528 ऐसे मामलों में सेना और पुलिस द्वारा फर्जी मुठभेड़ की बात उठाई थी. लेकिन सवाल ये है कि सेना भला किसी मासूम को क्यों मारने लगी? देश की खातिर अपनी जान दांव पर लगाने वाले जवानो के खिलाफ ये कैसी साजिश? और माननीय सुप्रीम कोर्ट जो एक दशक तक राम मंदिर पर फैसला नहीं सुना सके, जो अबतक ट्रिपल तलाक और बहु विवाह पर फैसला नहीं सुना सके, उन्होंने सेना के खिलाफ सीबीआई जांच बिठाने का फैसला ले लिया.

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    सेना ने सुप्रीम कोर्ट में अपना पक्ष रखते हुए कहा था कि वो 62 में से 30 मामलों में जांच करवा चुकी है लेकिन सुप्रीम कोर्ट को तो शायद सेना की जांच पर ही संदेह है, इसलिए सीबीआई अब सेना व् सुरक्षाबलों की जांच करेगी.

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    एक्सेस पावर का इस्तेमाल भी नहीं कर सकती सेना
    ये कोई पहला मामला नहीं है, जब सुप्रीम कोर्ट ने सेना के हाथ बांधे हों. कुछ ही वक़्त पहले मोदी सरकार ने मणिपुर से उग्रवादियों के खात्मे के लिए एक्सेस पावर का इस्तेमाल करने का फैसला लिया था लेकिन सुप्रीम कोर्ट को ये फैसला भी मंजूर नहीं हुआ और कोर्ट ने जुलाई 2016 को फैसला सुना दिया कि सेना या पुलिस वहां अत्याधिक बल का इस्तेमाल नहीं कर सकती और न्यूनतम फोर्स का इस्तेमाल करके केवल आत्मरक्षा ही करती रहे.

    यानी साफ़ शब्दों में कहा जाए तो आतंकियों और उग्रवादियों के खिलाफ सेना कोई आक्रामक ऑपरेशन ना चलाये. सुप्रीम कोर्ट के इस फैसले के खिलाफ मोदी सरकार ने क्यूरेटिव पेटिशन भी दाखिल की थी, जिसमे मोदी सरकार की और से गुजारिश की गयी थी कि कोर्ट इस फैसले पर फिर से विचार करे नहीं तो उग्रवादियों के खिलाफ सेना का आपरेशन कमजोर पडेगा.

    यदि सेना केवल आत्मरक्षा ही करेगी तो AFSPA लगाने का फायदा ही क्या होगा? मोदी सरकार की ओर से AG ने सुप्रीम कोर्ट में कहा भी कि जिस राज्य में उग्रवादी हिंसा फैला रहे हों और लगातार बम धमाके कर रहे हों, ऐसे मामलों में जरुरत आत्मरक्षा की नहीं बल्कि हमले करने की होती है. यदि यहाँ सुप्रीम कोर्ट सेना को एनकाउंटर ऑपरेशन नहीं चलाने देता है तो कल को इसका उदाहरण लेकर कश्मीर में भी सेना के ऑपरेशन में खलल डाला जाएगा.

    सुप्रीम कोर्ट ने खारिज की क्यूरेटिव पेटिशन !
    लेकिन 27 अप्रैल 2017 को माननीय सुप्रीम कोर्ट ने मोदी सरकार की क्यूरेटिव पेटिशन को भी खारिज कर दिया. यानि चाहे बम धमाके होते रहें, सेना व् बीएसएफ के जवान मरते रहें, मासूम व् निर्दोष लोग उग्रवादियों के हाथों मारे जाते रहें लेकिन सेना अतिरिक्त बल का इस्तमाल करके उनका एनकाउंटर नहीं कर सकती. उन्हें ख़त्म नहीं कर सकती. केवल हाथ पे हाथ रख कर आत्मरक्षा करने की ही अनुमति उन्हें दीं गयी है.

    और यदि सेना ने उग्रवादियों के एनकाउंटर कर भी दिए तो तथाकथित मानवाधिकार संगठन सेना पर ही आरोप मढ़ते नज़र आते हैं. इससे पहले सोहराबुद्दीन एनकाउंटर, इशरत जहान एनकाउंटर को भी फर्जी कहकर पुलिस व् सुरक्षाबलों और मोदी पर ऊँगली उठायी जा चुकी है. हैरानी की बात ये है कि सुप्रीम कोर्ट भी ऐसे लोगों का साथ देता नज़र आता है.


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