कारगिल युद्ध के दौरान अमेरिका ने जीपीएस देने से मना किया था भारत ने अपना जीपीएस बना डाला
भटके लोगो को रास्ता दिखायेगा 'नाविक'
1973 में अमेरिका के द्वारा बनाया गया जीपीएस ।
सन् 1999 में कारगिल युद्ध के दौरान प्रधान मंत्री अटल बिहारी वाजपई ने अमेरिका से जीपीएस की मदद मांगी जिससे युद्ध की इस्थिति का पता चल सके मगर अमेरिका ने जीपीएस देने से इंकार कर दिया तो भारत सरकार ने तभी ठाना अपना जीपीएस बनाएंगे
1420 करोड़ की लागत से बना ये जीपीएस ।
36000 किमी पृथ्वी से उचाई पर स्थापित किये गए सात उपग्रह ।
ये सेवाएं हो उपलब्ध
जमीनी , हवाई , समुंद्री navigation
वाहन ट्रैकिंग और फ्लीट प्रबंधन
मोबाइल फ़ोन की सुविधाएं भूगोलिक मैपिंग
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जीपीएस से ताकतवर
अमेरिका की जीपीएस प्रणाली में 24 उपग्रह है । इसकी सेवाएं पुरे विश्व में उपलब्ध है । वही नाविक ने सात उपग्रह है । इसकी सेवाएं सिर्फ भारत व आसपास के 1500 किमी क्षेत्र में ही उपलब्ध होगी । लेकिन वैज्ञानिक का दावा है कि जीपीएस से अधिक अचूक होगा ।
कैसे काम करता है जीपीएस? : जीपीएस (ग्लोबल पॉजिशनिंग सिस्टम) एक उपग्रह प्रणाली पर काम करता है। जीपीएस सीधे सेटेलाइट से कनेक्ट होता है और उपग्रहों द्वारा भेजे गए संदेशो पर काम करती है। जीपीएस डिवाइस उपग्रह से प्राप्ता सिंगनल द्वारा उस जगह को मैप में दशार्ती रहती है। वर्तमान में जीपीएस तीन प्रमुख क्षेत्रों से मिलकर बना हुआ है, स्पेस सेगमेंट, कंट्रोल सेगमेंट और यूजर सेगमेंट।
जीपीएस रिसीवर अपनी स्थिति का आकलन, पृथ्वी से ऊपर रखे गए जीपीएस सेटेलाइट द्वारा भेजे जाने वाले सिग्नलों के आधार पर करता है। प्रत्येक सेटेलाइट लगातार मैसेज ट्रांसमिट करता रहता है। रिसीवर प्रत्येक मैसेज का ट्रांजिट समय नोट करता है और प्रत्येक सेटेलाइट से दूरी की गणना करता है। ऐसा माना जाता है कि रिसीवर बेहतर गणना के लिए चार सेटेलाइट का इस्तेमाल करता है। इससे यूजर की थ्रीडी स्थिति (अंक्षाश, देशांतर रेखा और उन्नतांश) के बारे में पता चल जाता है। एक बार जीपीएस की स्थिति का पता चलने के बाद, जीपीएस यूनिट दूसरी जानकारियां जैसे कि स्पीड, ट्रेक, ट्रिप, दूरी, जगह से दूरी, सूर्य उगने और डूबने के समय के बारे में जानकारी एकत्र कर लेता है।
जीपीएस से बेहतर साबित हो सकता है आइआरएनएसएस : भारतीय आइआरएनएसएस अमेरिकन नेविगेशन सिस्टम जीपीएस से बेहतर साबित हो सकता है। मात्र 7 सैटेलाइट के जरिए यह अभी 20 मीटर के रेंज में नेविगेशन की सुविधा दे सकता है, जबकि उम्मीद की जा रही है कि यह इससे भी बेहतर 15 मीटर रेंज में भी यह सुविधा देगा। जीपीएस की इस कार्यक्षमता के लिए 24 सैटेलाइट काम करते हैं, जबकि आईआरएनएसएस के लिए मात्र सात सैटेलाइट जरूरी है लेकिन यहां यह ध्यान रखना जरूरी है कि जीपीएस की रेंज विश्वव्यापी है जबकि आईआरएनएसएस की रेंज भारत और एशिया तक ही सीमित है।
सुरक्षा एजेंसियों और सेना के लिए सुरक्षा की दृष्टि से भी आइआरएनएसएस काफी बेहतर है। नेविगेशन सैटेलाईट आईआरएनएसएस के अनुप्रयोगों में नक्शा तैयार करना, जियोडेटिक आंकड़े जुटाना, समय का बिल्कुल सही पता लगाना, चालकों के लिए दृश्य और ध्वनि के जरिये नौवहन की जानकारी, मोबाइल फोनों के साथ एकीकरण, भूभागीय हवाई तथा समुद्री नौवहन तथा यात्रियों तथा लंबी यात्रा करने वालों को भूभागीय नौवहन की जानकारी देना आदि शामिल हैं।
आईआरएनएसएस के सात उपग्रहों की यह श्रृंखला स्पेस सेगमेंट और ग्राउंड सेगमेंट दोनों के लिए है।आईआरएनएसएस के तीन उपग्रह भूस्थिर कक्षा जियोस्टेशनरी ऑर्बिट के लिए और चार उपग्रह भूस्थैतिक कक्षा जियोसिन्क्रोनस ऑर्बिट के लिए हैं। अब सातों उपग्रहों के प्रक्षेपण के बाद आईआरएनएसएस प्रणाली ठीक ढंग से काम करना शुरू कर देगी!
साधनों के बजाय प्रतिभाओं की बहुलता : मंगल यान की कामयाबी के बाद इसरों का लोहा पूरी दुनिया मान चुकी है। चांद पर पानी की खोज का श्रेय भी चंद्रयान-1 को ही मिला था । भविष्य में इसरों उन सभी ताकतों को और भी कड़ी टक्कर देगा, जो साधनों की बहुलता के चलते प्रगति कर रहा है, भारत के पास प्रतिभाओं की बहुलता है। आईआरएनएसएस-1 जी का सफल प्रक्षेपण एक बड़ी कामयाबी है, जिससे देश का अपना खुद का नेवीगेशन सिस्टम विकसित हो जाएगा, जो पूरे देश के लिए गर्व का विषय है क्योंकि ऐसी प्रणाली विश्व के सिर्फ कुछ ही देशों के पास है।
शशांक द्विवेदी चितौड़गढ, राजस्थाइन में मेवाड़ यूनिवर्सिटी में डिप्टी डायरेक्टर (रिसर्च) है और टेक्निकल टूडे पत्रिका के संपादक हैं। 12 सालों से विज्ञान विषय पर लिखते हुए विज्ञान और तकनीक पर केन्द्रित विज्ञानपीडिया डॉट कॉम के संचालक है । एबीपी न्यूज द्वारा विज्ञान लेखन के लिए सर्वश्रेष्ठ ब्लॉगर का सम्मान हासिल कर चुके शशांक को विज्ञान संचार से जुड़ी देश की कई संस्थाओं ने भी राष्ट्रीय स्तर पर सम्मानित किया है। वे देश के प्रतिष्ठित समाचार पत्रों और पत्रिकाओं में लगातार लिख रहे हैं।)
कैसे काम करता है जीपीएस? : जीपीएस (ग्लोबल पॉजिशनिंग सिस्टम) एक उपग्रह प्रणाली पर काम करता है। जीपीएस सीधे सेटेलाइट से कनेक्ट होता है और उपग्रहों द्वारा भेजे गए संदेशो पर काम करती है। जीपीएस डिवाइस उपग्रह से प्राप्ता सिंगनल द्वारा उस जगह को मैप में दशार्ती रहती है। वर्तमान में जीपीएस तीन प्रमुख क्षेत्रों से मिलकर बना हुआ है, स्पेस सेगमेंट, कंट्रोल सेगमेंट और यूजर सेगमेंट।
जीपीएस रिसीवर अपनी स्थिति का आकलन, पृथ्वी से ऊपर रखे गए जीपीएस सेटेलाइट द्वारा भेजे जाने वाले सिग्नलों के आधार पर करता है। प्रत्येक सेटेलाइट लगातार मैसेज ट्रांसमिट करता रहता है। रिसीवर प्रत्येक मैसेज का ट्रांजिट समय नोट करता है और प्रत्येक सेटेलाइट से दूरी की गणना करता है। ऐसा माना जाता है कि रिसीवर बेहतर गणना के लिए चार सेटेलाइट का इस्तेमाल करता है। इससे यूजर की थ्रीडी स्थिति (अंक्षाश, देशांतर रेखा और उन्नतांश) के बारे में पता चल जाता है। एक बार जीपीएस की स्थिति का पता चलने के बाद, जीपीएस यूनिट दूसरी जानकारियां जैसे कि स्पीड, ट्रेक, ट्रिप, दूरी, जगह से दूरी, सूर्य उगने और डूबने के समय के बारे में जानकारी एकत्र कर लेता है।
जीपीएस से बेहतर साबित हो सकता है आइआरएनएसएस : भारतीय आइआरएनएसएस अमेरिकन नेविगेशन सिस्टम जीपीएस से बेहतर साबित हो सकता है। मात्र 7 सैटेलाइट के जरिए यह अभी 20 मीटर के रेंज में नेविगेशन की सुविधा दे सकता है, जबकि उम्मीद की जा रही है कि यह इससे भी बेहतर 15 मीटर रेंज में भी यह सुविधा देगा। जीपीएस की इस कार्यक्षमता के लिए 24 सैटेलाइट काम करते हैं, जबकि आईआरएनएसएस के लिए मात्र सात सैटेलाइट जरूरी है लेकिन यहां यह ध्यान रखना जरूरी है कि जीपीएस की रेंज विश्वव्यापी है जबकि आईआरएनएसएस की रेंज भारत और एशिया तक ही सीमित है।
सुरक्षा एजेंसियों और सेना के लिए सुरक्षा की दृष्टि से भी आइआरएनएसएस काफी बेहतर है। नेविगेशन सैटेलाईट आईआरएनएसएस के अनुप्रयोगों में नक्शा तैयार करना, जियोडेटिक आंकड़े जुटाना, समय का बिल्कुल सही पता लगाना, चालकों के लिए दृश्य और ध्वनि के जरिये नौवहन की जानकारी, मोबाइल फोनों के साथ एकीकरण, भूभागीय हवाई तथा समुद्री नौवहन तथा यात्रियों तथा लंबी यात्रा करने वालों को भूभागीय नौवहन की जानकारी देना आदि शामिल हैं।
आईआरएनएसएस के सात उपग्रहों की यह श्रृंखला स्पेस सेगमेंट और ग्राउंड सेगमेंट दोनों के लिए है।आईआरएनएसएस के तीन उपग्रह भूस्थिर कक्षा जियोस्टेशनरी ऑर्बिट के लिए और चार उपग्रह भूस्थैतिक कक्षा जियोसिन्क्रोनस ऑर्बिट के लिए हैं। अब सातों उपग्रहों के प्रक्षेपण के बाद आईआरएनएसएस प्रणाली ठीक ढंग से काम करना शुरू कर देगी!
साधनों के बजाय प्रतिभाओं की बहुलता : मंगल यान की कामयाबी के बाद इसरों का लोहा पूरी दुनिया मान चुकी है। चांद पर पानी की खोज का श्रेय भी चंद्रयान-1 को ही मिला था । भविष्य में इसरों उन सभी ताकतों को और भी कड़ी टक्कर देगा, जो साधनों की बहुलता के चलते प्रगति कर रहा है, भारत के पास प्रतिभाओं की बहुलता है। आईआरएनएसएस-1 जी का सफल प्रक्षेपण एक बड़ी कामयाबी है, जिससे देश का अपना खुद का नेवीगेशन सिस्टम विकसित हो जाएगा, जो पूरे देश के लिए गर्व का विषय है क्योंकि ऐसी प्रणाली विश्व के सिर्फ कुछ ही देशों के पास है।
शशांक द्विवेदी चितौड़गढ, राजस्थाइन में मेवाड़ यूनिवर्सिटी में डिप्टी डायरेक्टर (रिसर्च) है और टेक्निकल टूडे पत्रिका के संपादक हैं। 12 सालों से विज्ञान विषय पर लिखते हुए विज्ञान और तकनीक पर केन्द्रित विज्ञानपीडिया डॉट कॉम के संचालक है । एबीपी न्यूज द्वारा विज्ञान लेखन के लिए सर्वश्रेष्ठ ब्लॉगर का सम्मान हासिल कर चुके शशांक को विज्ञान संचार से जुड़ी देश की कई संस्थाओं ने भी राष्ट्रीय स्तर पर सम्मानित किया है। वे देश के प्रतिष्ठित समाचार पत्रों और पत्रिकाओं में लगातार लिख रहे हैं।)



