मुसलमानों पाकिस्तान जाओ, ये देश हमारा है...
जब भी भारत में मुसलमानों की बात की जाती है तो देश के हितैषियों के मुँह पर शिकन पड़ जाती है। भारत में मुस्लिमों के नाम पर जिस तरह के भ्रामक प्रचार किये जाते हैं उन पर किसी बुद्धिजीवी ने कोई लेख नही लिखा है शायद वजह यह हो की वो जानते हैं कि भारत की आवाम पर अब इस तर्क वितर्क का कोई फर्क नही पड़ने वाला है। साम्प्रदायिक सद्भाव के ख़िलाफ़ लड़ रहे धर्म के ठेकेदारों ने देश की जमीन में धार्मिक नफ़रत का ऐसा बीज बो दिया है जिसकी फ़सल सिर्फ क़त्ल ए आम से ही कट सकती है।
मेरा एक प्रयास है उस मानसिकता को बदलने का जो देश में नफ़रत की आग लगा रही है। सबसे पहले रौशनी इस तथ्य पर होनी चाहिए की क्या यक़ीनन भारत सिर्फ हिन्दुओं का देश है? इस्लाम अगर सऊदी का धर्म है तो हिंदुस्तान में इसका वजूद कैसे कायम हुआ। इस्लाम की ज़मीनी हकीकत क्या है? सर्वप्रथम मैं खंडन करूँगा उस तर्क का जिसमें लोग कहते हैं कि इस्लाम बेबुनियाद धर्म है। इस तर्क के खंडन के लिए महज़ इतना तर्क काफी है कोई बेबुनियादी चीज़ कैसे अपनी मजबूत बुनियाद कायम कर सकती है जबकि वह बेबुनियादी है तो। असल में तो यह स्पष्ठ है कि भारत का इतिहास जितना पुराना है। इस्लाम का इतिहास भी उससे ज़्यादा पुराना है।
इस रहस्य को समझने का इससे बेहतर नज़रिया भले क्या हो सकता है कि जब देश ग़ुलाम था अंग्रेजी हुकूमत थी तब भी मुसलमान देश में था। अंग्रजी सल्तनत की लात घूसों और चाबुक की मार वाली ग़ुलामी देश के हर नागरिक ने झेली है। इसका दूसरा तथ्य यह भी है कि इस्लाम और मुसलमान था तभी तो पाकिस्तान की स्थापना हुई। लिहाज़ा यह समझना ज़रा भी मुश्किल नही है कि इस्लाम का इतिहास भारत में बहुत प्राचीन है। अब नज़र डालते हैं इस्लाम की पैदाइश पर जिसका असल वजूद या यूँ कहे की उसका केंद्र सऊदी है तो इतने हज़ारो किलोमीटर दूर तक इस्लाम कैसे चलकर आया जबकि यह महज़ एक दीन की दावत से जुड़ा है। दरसल मेरी खुदकी राय में मैं यही कहूंगा कि इस्लाम कोई डिब्बे में बंद मिठाई नही है जिसे कोई महानुभाव सऊदी से ले आये और जिसके खाने भर से ही इस्लाम भारत में फ़ैल गया मुसलमानों की रचना होती गयी।
इस्लामिक रिसर्च सेंटर औरंगाबाद मुम्बई के जरिये की गयी प्रेस कॉन्फ्रेंस में दिए गए बयान के मुताबिक इस्लाम की पैदाइश उस वक़्त हुई जब भारत के एक बड़े राजा ने सऊदी से संपर्क कर वहाँ के इलाज करने वाले वैध को देश आने का निमंत्रण दिया और ये जानना चाहा की भूमण्डल पर यह कैसे मुमकिन है कि दुनिया में ख़ुदा जैसी भी कोई शख्सियत हो सकती है जिसकी इबादत पूजा महज़ नमाज़ पढ़ने भर से पूरी हो जाती है। कई इतिहासकारों ने इस वक्तव्य को पहले भी लिखा है। लेकिन सवाल अब भी यही है कि भारत में इस्लाम इस कदर क्यों बढ़ गया। इतिहास भी जुबान से बोलता है जरूरत है तो उन कानो की जो उस आवाज़ को सुन सके।
औरंगजेब के दौर में मैं नही था पर औरंगजेब आज भी हमारे दौर में जिन्दा है। इतिहास कहता है कि औरंगजेब ऐसा शासक था जिसने तलवार के दम पर जबरन हिन्दुओं को इस्लाम कबूल कराया था पर मैं इस बात की जड़ में नही घुसना चाहता हूँ यह बात कुछ ऐसी है जैसे मुर्गी पहले आयी या अंडा पर बहस करना। मैं बात करूँगा उस सच की जो आज सबके लिए समझना जरूरी है। भारत में जब दंगे होते हैं तो कहा जाता है, मुसलमानों पाकिस्तान जाओ ये देश हमारा है। मैं विभाजन के वक़्त पैदा भी नही हुआ था ये कैसे बताऊं की विभाजन की जो कहानी हम सुनते आये हैं वह असल में क्या है?
मैं बस यही याद दिलाऊंगा की भारत में ना पैगम्बर मोहम्मद पैदा हुए ना कुरान का करम नाज़िल हुआ। फिर भी तलवार के दम पर मुस्लमान बनने वाले हिन्दू कभी मुस्लिम धर्म से नही बदले औरंगजेब के होते तो ये डर जायज़ भी था पर जब औरंगजेब नही था तब किसका डर था। क्यों वह मुसलमान वापस हिन्दू ना हो सके क्यों वह अपनी औलादों को इस्लाम उनकी पहचान बनाकर दे गए कहीं ना कहीं यह तथ्य इशारा करता है इस तरफ की इस्लाम ना तो बेबुनियाद है और ना ही तलवारों के दम पनपा है। बल्कि यह मूल स्रोत है उन विचारों का जो किसी भी इंसान को ज़हनी तौर पर एक अच्छा इंसान बना सकता है।
घमण्ड, ईष्या, चोरी डकैती, बलात्कार नशाखोरी जैसी गन्दी आदतों से परे हटा सकता है जिस परमात्मा की तलाश में इंसान भागता है इस्लाम उससे सीधे तौर पर जोड़ता है। जब बात जहन की है तो हमें समझना चाहिए की हर वो शख्स जो आज मुसलमान है और पुराने वक़्त से भारत में रहा हो वह कैसे पाकिस्तानी हो सकता है। जबकि वह हिंदुस्तान में ही पैदा हुआ यहीं पला यहीं बड़ा हुआ। जब विभाजन हुआ तो सरहद पार से हज़ारों हिन्दू भारत आ गये पर सौ मुसलमान भी पाकिस्तान नहीं गए और जो गए वह चले ही गए। पर जो यहाँ रहे उनपर हम यह इल्जाम कैसे लगा सकते हैं कि वह देशद्रोही हैं। किस आधार पर हम यह आंकलन कर सकते हैं कि वह भारत में इसलिए रुके क्योंकि उन्हें यहा
मेरा एक प्रयास है उस मानसिकता को बदलने का जो देश में नफ़रत की आग लगा रही है। सबसे पहले रौशनी इस तथ्य पर होनी चाहिए की क्या यक़ीनन भारत सिर्फ हिन्दुओं का देश है? इस्लाम अगर सऊदी का धर्म है तो हिंदुस्तान में इसका वजूद कैसे कायम हुआ। इस्लाम की ज़मीनी हकीकत क्या है? सर्वप्रथम मैं खंडन करूँगा उस तर्क का जिसमें लोग कहते हैं कि इस्लाम बेबुनियाद धर्म है। इस तर्क के खंडन के लिए महज़ इतना तर्क काफी है कोई बेबुनियादी चीज़ कैसे अपनी मजबूत बुनियाद कायम कर सकती है जबकि वह बेबुनियादी है तो। असल में तो यह स्पष्ठ है कि भारत का इतिहास जितना पुराना है। इस्लाम का इतिहास भी उससे ज़्यादा पुराना है।
इस रहस्य को समझने का इससे बेहतर नज़रिया भले क्या हो सकता है कि जब देश ग़ुलाम था अंग्रेजी हुकूमत थी तब भी मुसलमान देश में था। अंग्रजी सल्तनत की लात घूसों और चाबुक की मार वाली ग़ुलामी देश के हर नागरिक ने झेली है। इसका दूसरा तथ्य यह भी है कि इस्लाम और मुसलमान था तभी तो पाकिस्तान की स्थापना हुई। लिहाज़ा यह समझना ज़रा भी मुश्किल नही है कि इस्लाम का इतिहास भारत में बहुत प्राचीन है। अब नज़र डालते हैं इस्लाम की पैदाइश पर जिसका असल वजूद या यूँ कहे की उसका केंद्र सऊदी है तो इतने हज़ारो किलोमीटर दूर तक इस्लाम कैसे चलकर आया जबकि यह महज़ एक दीन की दावत से जुड़ा है। दरसल मेरी खुदकी राय में मैं यही कहूंगा कि इस्लाम कोई डिब्बे में बंद मिठाई नही है जिसे कोई महानुभाव सऊदी से ले आये और जिसके खाने भर से ही इस्लाम भारत में फ़ैल गया मुसलमानों की रचना होती गयी।
इस्लामिक रिसर्च सेंटर औरंगाबाद मुम्बई के जरिये की गयी प्रेस कॉन्फ्रेंस में दिए गए बयान के मुताबिक इस्लाम की पैदाइश उस वक़्त हुई जब भारत के एक बड़े राजा ने सऊदी से संपर्क कर वहाँ के इलाज करने वाले वैध को देश आने का निमंत्रण दिया और ये जानना चाहा की भूमण्डल पर यह कैसे मुमकिन है कि दुनिया में ख़ुदा जैसी भी कोई शख्सियत हो सकती है जिसकी इबादत पूजा महज़ नमाज़ पढ़ने भर से पूरी हो जाती है। कई इतिहासकारों ने इस वक्तव्य को पहले भी लिखा है। लेकिन सवाल अब भी यही है कि भारत में इस्लाम इस कदर क्यों बढ़ गया। इतिहास भी जुबान से बोलता है जरूरत है तो उन कानो की जो उस आवाज़ को सुन सके।
औरंगजेब के दौर में मैं नही था पर औरंगजेब आज भी हमारे दौर में जिन्दा है। इतिहास कहता है कि औरंगजेब ऐसा शासक था जिसने तलवार के दम पर जबरन हिन्दुओं को इस्लाम कबूल कराया था पर मैं इस बात की जड़ में नही घुसना चाहता हूँ यह बात कुछ ऐसी है जैसे मुर्गी पहले आयी या अंडा पर बहस करना। मैं बात करूँगा उस सच की जो आज सबके लिए समझना जरूरी है। भारत में जब दंगे होते हैं तो कहा जाता है, मुसलमानों पाकिस्तान जाओ ये देश हमारा है। मैं विभाजन के वक़्त पैदा भी नही हुआ था ये कैसे बताऊं की विभाजन की जो कहानी हम सुनते आये हैं वह असल में क्या है?
मैं बस यही याद दिलाऊंगा की भारत में ना पैगम्बर मोहम्मद पैदा हुए ना कुरान का करम नाज़िल हुआ। फिर भी तलवार के दम पर मुस्लमान बनने वाले हिन्दू कभी मुस्लिम धर्म से नही बदले औरंगजेब के होते तो ये डर जायज़ भी था पर जब औरंगजेब नही था तब किसका डर था। क्यों वह मुसलमान वापस हिन्दू ना हो सके क्यों वह अपनी औलादों को इस्लाम उनकी पहचान बनाकर दे गए कहीं ना कहीं यह तथ्य इशारा करता है इस तरफ की इस्लाम ना तो बेबुनियाद है और ना ही तलवारों के दम पनपा है। बल्कि यह मूल स्रोत है उन विचारों का जो किसी भी इंसान को ज़हनी तौर पर एक अच्छा इंसान बना सकता है।
घमण्ड, ईष्या, चोरी डकैती, बलात्कार नशाखोरी जैसी गन्दी आदतों से परे हटा सकता है जिस परमात्मा की तलाश में इंसान भागता है इस्लाम उससे सीधे तौर पर जोड़ता है। जब बात जहन की है तो हमें समझना चाहिए की हर वो शख्स जो आज मुसलमान है और पुराने वक़्त से भारत में रहा हो वह कैसे पाकिस्तानी हो सकता है। जबकि वह हिंदुस्तान में ही पैदा हुआ यहीं पला यहीं बड़ा हुआ। जब विभाजन हुआ तो सरहद पार से हज़ारों हिन्दू भारत आ गये पर सौ मुसलमान भी पाकिस्तान नहीं गए और जो गए वह चले ही गए। पर जो यहाँ रहे उनपर हम यह इल्जाम कैसे लगा सकते हैं कि वह देशद्रोही हैं। किस आधार पर हम यह आंकलन कर सकते हैं कि वह भारत में इसलिए रुके क्योंकि उन्हें यहा



