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    आज शरण मांग रहा, कल देश मांगेगा, परसों जान भी.. क्या क्या दे दें ? - सुरेश चव्हाणके

    अहिंसा का अर्थ शायद हम भूल गए हैं या भुला दिया गया एक सोची समझी रणनीति के चलते . अहिंसा का सिद्धांत केवल निरीह जीवो पर करने के लिए लागू होता है, हिंसक जंतुओं पर हिंसा का सिद्धांत ही लागू होता है क्योकि आत्मरक्षा का अधिकार संविधान और प्रकृति भी मानव को देती है..

    आज म्यांमार से जो भी लाखों आये हैं वो किसी प्रकार के धर्मनिष्ठ , कर्तव्यपरायण और देशभक्त नहीं है . ये वो हैं जो जहाँ भी गए उसे तबाह कर दिया .. इन्होने दुनिया की सबसे शांतिप्रिय और धर्मनिष्ठ जाति को भी तब तक उकसाया जब तक वो प्रतिकार के लिए विवश नहीं हो गयी .

    कुछ सवाल उठ रहे हैं यहाँ .. जो अपने वतन के नहीं हुए वो हमारे कैसे होंगे ? जो बौद्धों के साथ नहीं रह सकें वो हिन्दुओं के साथ कैसे रह पाएंगे ? हिन्दुओं का भगवा बौद्धों का भगवा , हिन्दुओं के बुद्ध बौद्धों के बुद्ध , हिन्दुओं का ॐ बौद्धों का ॐ ये सब एक ही हैं . हिन्दू के ही अंग हैं बौद्ध . भगवान बुद्ध ने स्वयं कहा था कि एस धम्‍मो सनंतनो ,, अर्थात यही सनातन धर्म है ... हम सभी उसी सनातन के अंग है और हमारे एक ही अंग से शत्रुता रख कर चल रहे आतंकियों से हमारी मित्रता का आधार क्या होगा ? क्या भारत के बहुसंख्यक वर्ग की भावनाओ का बार बार दमन होगा ?

    आज शरण मांगी है , कल फिर एक नया मुल्क मांगेगे फिर बौद्धों की तरह हमारे प्राण भी मांगेगे .. आखिर क्या क्या देंगे हम ? बंगलादेशियो की तरह अब कौन सा इलाका होगा जो इनसे प्रभावित होगा .. इतना तो तय है कि राष्ट्रवादी किसी भी हालत में अब देश नहीं बंटने देंगे .. सुदर्शन न्यूज आह्वान करता है उन सभी राष्ट्रवादियों से जो इस देश के इस काल में इस चिंता में है कि अब कुछ भी हो पर धार्मिक आधार पर इस देश को नहीं बंटने देंगे .. आइये एक साथ एक राष्ट्रवादी बन कर एक सूत्र में पिरो लेते हैं खुद को और प्रतिकार करते हैं हमारे ही अंग बौद्धों के हत्यारे उन रोहिंग्याओं का जिन्होने जहाँ भी कदम रखा वो जमीन बर्बाद हो गयी .. देश की सर्वप्रथम जरूरत यही है आज ...

    Source-Sudarsannews.com

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