40 साल पहले जर्मनी से आई थी मथुरा, सुदेवी दासी बनकर यही की हो गयी, जीवन गौसेवा को किया समर्पित !
कोन्हई गांव के कस्बाई बसावट से कुछ फर्लांग दूर राधा सुरभि गोशाला है । यहा "हजार बछड़ों की मां" सुदेवी दासी है । इस गोशाला में 1200 से अधिक वृद्ध गाय, बैल और बछड़े हैं जो या तो बीमार हैं या किसी दुर्घटना में जख्मी हुए हैं । किसी गाय से चला नहीं जाता तो किसी को दिखाई नहीं देता । सुदेवी ने ऐसी ही गायों की निःस्वार्थ सेवा के लिए स्वयं को समर्पित कर दिया है ।
2 मार्च 1958 को जर्मनी के बर्लिन शहर में जन्मी सुदेवी दासी का मूल नाम फ्रेडरिक इरिन ब्रूनिंग है । सुदेवी ने कहा कि, वह 1978-79 में पर्यटक के तौर पर भारत आईं, तब उनकी आयु 20 साल थी । वह थाईलैंड, सिंगापुर, इंडोनेशिया और नेपाल की सैर पर भी गईं, परंतु उनका मन ब्रज में आकर ही लगा ।
सुदेवी कहती हैं कि, वह राधाकुंड में गुरु दीक्षा लेकर पूजा, जप और परिक्रमा करती रहीं । एक दिन उनके पड़ोसी ने कहा कि उन्हें गाय पालनी चाहिए, तब से उन्हें गाय-बछड़ों से विशेष लगाव हो गया और यहीं से उनके गोसेवा मिशन की शुरुआत हुई ।
उनके पिता जर्मन सरकार में आला अधिकारी थे और जब उन्हें यह खबर मिली तो उन्होंने अपनी इकलौती संतान को समझाने के लिए पोस्टिंग देहली स्थित जर्मन दूतावास में करा ली, परंतु सुदेवी ने अपना निश्चय नहीं बदला । आज भी हर दिन उनकी एंबुलेंस आठ से दस गायें लेकर आती है जो या तो किसी दुर्घटना में घायल हुई होती हैं या वृद्ध और असहाय हैं । वह उनका उपचार करती हैं ।
गोशाला चलाए रखने की चुनौतियां भी कम नहीं हैं । ये गाय-बछड़े उनके बच्चे हैं, वह कैसे इन्हें छोड़ सकती हैं । अब तो दूसरी गोशालाओं ने भी बीमार और वृद्ध गायों को उनकी गोशाला में भेजना शुरू कर दिया है । वह उन्हें बेहिचक रख लेती हैं क्योंकि उनको लगता है कि, यहां रहने से उनकी पीड़ा कुछ कम हो जाएगी ।
गोशाला में 60 लोग काम करते हैं जिससे उनका परिवार चलता है । हर महीने गोशाला पर लगभग 25 लाख रुपए खर्च होते हैं । यह धनराशि वह बर्लिन में अपनी पैतृक संपत्ति से मिलने वाले सालाना किराए और यहां से मिलने वाले दान से जुटाती हैं ।
Source-Dainik-bharat.com
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2 मार्च 1958 को जर्मनी के बर्लिन शहर में जन्मी सुदेवी दासी का मूल नाम फ्रेडरिक इरिन ब्रूनिंग है । सुदेवी ने कहा कि, वह 1978-79 में पर्यटक के तौर पर भारत आईं, तब उनकी आयु 20 साल थी । वह थाईलैंड, सिंगापुर, इंडोनेशिया और नेपाल की सैर पर भी गईं, परंतु उनका मन ब्रज में आकर ही लगा ।
सुदेवी कहती हैं कि, वह राधाकुंड में गुरु दीक्षा लेकर पूजा, जप और परिक्रमा करती रहीं । एक दिन उनके पड़ोसी ने कहा कि उन्हें गाय पालनी चाहिए, तब से उन्हें गाय-बछड़ों से विशेष लगाव हो गया और यहीं से उनके गोसेवा मिशन की शुरुआत हुई ।
उनके पिता जर्मन सरकार में आला अधिकारी थे और जब उन्हें यह खबर मिली तो उन्होंने अपनी इकलौती संतान को समझाने के लिए पोस्टिंग देहली स्थित जर्मन दूतावास में करा ली, परंतु सुदेवी ने अपना निश्चय नहीं बदला । आज भी हर दिन उनकी एंबुलेंस आठ से दस गायें लेकर आती है जो या तो किसी दुर्घटना में घायल हुई होती हैं या वृद्ध और असहाय हैं । वह उनका उपचार करती हैं ।
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गोशाला में 60 लोग काम करते हैं जिससे उनका परिवार चलता है । हर महीने गोशाला पर लगभग 25 लाख रुपए खर्च होते हैं । यह धनराशि वह बर्लिन में अपनी पैतृक संपत्ति से मिलने वाले सालाना किराए और यहां से मिलने वाले दान से जुटाती हैं ।
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