पूर्व रक्षामंत्री मनोहर पर्रिकर ने कर्नल पुरोहित मामले पर किया बड़ा खुलासा, सेना भी रह गयी हैरान !
नई दिल्ली : 9 साल बाद कर्नल पुरोहित को जमानत मिली है. उनकी रिहाई की खबर पर बड़े-बड़े राजनेताओं की प्रतिक्रया आने लगी है. उनके खिलाफ की गयी साजिश को लेकर नए-नए खुलासे सामने आ रहे हैं. हालांकि सेना ने कर्नल पुरोहित को मीडिया में बयान देने से मना किया है, लेकिन अब देश के पूर्व रक्षा मंत्री मनोहर पर्रिकर ने कर्नल पुरोहित के लेकर बड़ा बयान जारी किया है.
सेना ने नहीं मुहैय्या कराई पर्याप्त सुरक्षा !
पर्रिकर ने कर्नल पुरोहित मामले न्यूज़ एजेंसी एएनआई को बयान दिया है. अपने बयान में उन्होंने कहा कि यदि उस वक़्त (साजिश के दौरान) भारतीय सेना ने कर्नल पुरोहित का साथ दिया होता तो उन्हें मालेगांव ब्लास्ट में फंसाया नहीं जा सकता था और ना ही उन्हें 9 साल जेल में गुजारने पड़ते.
मगर ऐसा नहीं हुआ और कर्नल पुरोहित को सुनियोजित साजिश के तहत फंसा लिया गया. उस दौरान सेना ने कर्नल पुरोहित को पर्याप्त सुरक्षा नहीं मुहैय्या कराई, इसी कारण विरोधियों के लिए उन्हें फंसाना आसान हो गया. हालांकि पर्रिकर ने ये भी कहा कि उनके इस बयान पर राजनीति ना की जाय, क्योंकि ये उनकी व्यक्तिगत राय है.
दरअसल 2008 मालेगांव ब्लास्ट के बाद कर्नल पुरोहित पर ब्लास्ट के लिए आरडीएक्स सप्लाई करने का आरोप लगाकर उन्हें सलाखों के पीछे डाल दिया गया था. प्रधानमंत्री मोदी को भेजे अपने खत में कर्नल पुरोहित ने खुद भी इस बात का जिक्र किया था कि कैसे राजनीतिक साजिश के तहत उन्हें फंसाया गया और उन्हें थर्ड डिग्री की यातनाएं दी गयी, वो जुर्म कबूलवाने के लिए, जो उन्होंने कभी किया ही नहीं.
9 साल तक कर्नल जेल की अँधेरी कोठरी में कैद रहे हालांकि ना तो उनके खिलाफ कोई पुख्ता सबूत मिले और ना ही उनके खिलाफ इन 9 सालों में कोई चार्जशीट दायर की गयी. हैरानी की बात तो ये थी कि बात-बात पर मोदी सरकार को फटकार लगा देने वाले सुप्रीम कोर्ट ने भी कर्नल पुरोहित के इस मामले को नजरअंदाज कर दिया कि 9 सालों से उन्हें किसी सबूत के ही बंद रखा गया, चार्ज शीट तक नहीं दाखिल की गयी.
बताया जा रहा है कि कर्नल सेना के जांबाज अफसर रहे हैं और उस दौरान भी वो सेना के खुफिया मिशन पर थे. फिर भी उनके खिलाफ साजिश करके फंसा दिया गया और सेना के किसी भी अधिकारी ने खुलकर उनका साथ नहीं दिया. केवल उन्हें उनकी तनख्वा दी जाती रही. सेना का कोई अधिकारी यदि कोई अपराध करता भी है तो उसका मुकदमा मिलिट्री कोर्ट में चलाया जाता है, मगर कर्नल को उनके हाल पर छोड़ दिया गया. शायद यही वजह है कि पूर्व रक्षामंत्री जो सदा सेना के पक्ष में खड़े रहते आये हैं, उन्हें खुद ये कहना पड़ा कि सेना ने उस वक़्त अपने इस जाबांज अफसर को पर्याप्त सुरक्षा मुहैया नहीं कराई, जिस कारण कर्नल को इतनी तकलीफें, इतने अपमान झेलने पड़े.
सेना ने नहीं मुहैय्या कराई पर्याप्त सुरक्षा !
पर्रिकर ने कर्नल पुरोहित मामले न्यूज़ एजेंसी एएनआई को बयान दिया है. अपने बयान में उन्होंने कहा कि यदि उस वक़्त (साजिश के दौरान) भारतीय सेना ने कर्नल पुरोहित का साथ दिया होता तो उन्हें मालेगांव ब्लास्ट में फंसाया नहीं जा सकता था और ना ही उन्हें 9 साल जेल में गुजारने पड़ते.
मगर ऐसा नहीं हुआ और कर्नल पुरोहित को सुनियोजित साजिश के तहत फंसा लिया गया. उस दौरान सेना ने कर्नल पुरोहित को पर्याप्त सुरक्षा नहीं मुहैय्या कराई, इसी कारण विरोधियों के लिए उन्हें फंसाना आसान हो गया. हालांकि पर्रिकर ने ये भी कहा कि उनके इस बयान पर राजनीति ना की जाय, क्योंकि ये उनकी व्यक्तिगत राय है.
दरअसल 2008 मालेगांव ब्लास्ट के बाद कर्नल पुरोहित पर ब्लास्ट के लिए आरडीएक्स सप्लाई करने का आरोप लगाकर उन्हें सलाखों के पीछे डाल दिया गया था. प्रधानमंत्री मोदी को भेजे अपने खत में कर्नल पुरोहित ने खुद भी इस बात का जिक्र किया था कि कैसे राजनीतिक साजिश के तहत उन्हें फंसाया गया और उन्हें थर्ड डिग्री की यातनाएं दी गयी, वो जुर्म कबूलवाने के लिए, जो उन्होंने कभी किया ही नहीं.
9 साल तक कर्नल जेल की अँधेरी कोठरी में कैद रहे हालांकि ना तो उनके खिलाफ कोई पुख्ता सबूत मिले और ना ही उनके खिलाफ इन 9 सालों में कोई चार्जशीट दायर की गयी. हैरानी की बात तो ये थी कि बात-बात पर मोदी सरकार को फटकार लगा देने वाले सुप्रीम कोर्ट ने भी कर्नल पुरोहित के इस मामले को नजरअंदाज कर दिया कि 9 सालों से उन्हें किसी सबूत के ही बंद रखा गया, चार्ज शीट तक नहीं दाखिल की गयी.
बताया जा रहा है कि कर्नल सेना के जांबाज अफसर रहे हैं और उस दौरान भी वो सेना के खुफिया मिशन पर थे. फिर भी उनके खिलाफ साजिश करके फंसा दिया गया और सेना के किसी भी अधिकारी ने खुलकर उनका साथ नहीं दिया. केवल उन्हें उनकी तनख्वा दी जाती रही. सेना का कोई अधिकारी यदि कोई अपराध करता भी है तो उसका मुकदमा मिलिट्री कोर्ट में चलाया जाता है, मगर कर्नल को उनके हाल पर छोड़ दिया गया. शायद यही वजह है कि पूर्व रक्षामंत्री जो सदा सेना के पक्ष में खड़े रहते आये हैं, उन्हें खुद ये कहना पड़ा कि सेना ने उस वक़्त अपने इस जाबांज अफसर को पर्याप्त सुरक्षा मुहैया नहीं कराई, जिस कारण कर्नल को इतनी तकलीफें, इतने अपमान झेलने पड़े.




