Header Ads

  • Breaking News

    पूर्वी पाक : 8 महीनों में 25 लाख हिन्दुओ की हत्या, 90% दलित ही थे, इतिहास से सीखो !

    loading...
    1947 से पहले का जो बंगाल था, मुसलमान बहुसंख्यक हो चुके थे
    हिन्दुओ में दलित और ब्राह्मण जाति के अधिकतर लोग थे, बंटवारे के बाद बड़े पैमाने पर कत्लेआम हुआ

    ब्राह्मण और अन्य हिन्दू तो आख़िरकार पश्चिम बंगाल में आ गए
    पर दलित बड़े पैमाने पर जय मीम जय भीम के नारे के तहत पूर्वी पाकिस्तान में ही रह गए
    loading...

    और इसके पीछे था उस समय बंगाल में दलितों का सबसे बड़ा जेता जोगेन्द्रनाथ मंडल
    जिन्नाह के चक्कर में जोगेन्द्रनाथ मंडल जय भीम जय मीम में फंस गया, और जोगेन्द्रनाथ मंडल के इशारे पर चलने वाला दलित समाज भी इस से प्रभावित हुआ

    बंगाल के अधिकतर दलित पूर्वी पाकिस्तान में ही रहे, कत्लेआम के बाद भी उनको जय मीम जय भीम का नारा याद रहा, 1947 के बाद भी 50 लाख के आसपास दलित पूर्वी पाकिस्तान में ही रहे

    पूर्वी पाकिस्तान बनने के बाद से ही वहां समस्या उत्पन्न होने लगी
    1971 तक ऐसे ही चलता रहा,

    loading...

    26 मार्च 1971 को जमात-ए-इस्लामी के आतंकियों और पाकिस्तानी सेना ने मिलकर जो नरसंहार शुरू किया था वह द्वितीय विश्व युद्ध के बाद विश्व का दूसरा सबसे बड़ा नरसंहार था

    जिसमें 25-30 लाख हिंदुओं को 8 माह के भीतर मार दिया गया, मरने वाले हिंदुओं में 90% दलित ही थे,
    ब्राह्मण और अन्य हिन्दू तो पश्चिम बंगाल में आ गए थे पर जोगेन्द्रनाथ मंडल के चक्कर में दलित हिन्दू पूर्वी पाकिस्तान में ही रहे

    यह कत्लेआम इतना भीषण था कि 28 मार्च को ढाका स्थित अमेरिकी कॉउंसेलेट ने इसे हिंदुओं का सेलेक्टिव कत्लेआम घोषित कर दिया।

    यह सब गलती बंगाल के दलित नेता जोगेन्द्रनाथ मंडल की थी, जिन्होंने जिन्ना के बहकावे में आकर बंगाल में दलितों के घर जा जाकर इन्होंने उनसे पाकिस्तान के समर्थन में वोट डालने को कहा था, और जब मुस्लिमों को पाकिस्तान मिल गया तो उन्होंने इन लोगों को लात मारकर बाहर कर दिया या मार दिया।

    आज भी मायावती और अन्य नेताओं के रूप में बहुत से जोगेन्द्रनाथ मंडल घूम रहे है, जो वही गलती आज भी कर रहे है
    1971 में हिन्दुओ का कत्लेआम असल में दलित हिन्दुओ का कत्लेआम था, जय मीम जय भीम का नारा बिलकुल काम नहीं आया
    और 25 लाख से अधिक का क़त्ल बलात्कार 8 महीनो में ही किया गया

    क्या कभी दलित हितैषी नेताओं की हिम्मत हुई की वह यह इतिहास अपने समाज को पढ़ा सके।

    Post Top Ad

    Advertisements

    Post Bottom Ad

    Advertisements