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    मेरी ज़िन्दगी का मक़सद मुस्लिमों का ख़त्मा था, पर क़ुरआन को जानने से पता चला कि इस्लाम हम इंसानों के लिए एक प्यारा मज़हब है: इब्राहिम किल्लिंग्टन


    अस्सलामु अलैकुम वरहमतुल्लाहि वबराकातुह,मेरा नाम इब्राहिम किल्लिंग्टन है। इस्लाम में आने से पहले मेरा सारा ध्यान शराब, ड्रग्स और मज़ा करना मेरी ज़िन्दगी का मक़सद था। मैं चाहता था कि मेरी ज़िन्दगी सिर्फ जैसे तैसे जब तक जीते रहो जैसी थी। मेरी दोस्ती भी सिर्फ ऐसे ही लोगों से थी।पहले तो मुझे मुसलमानो से कोई मतलब ही नही था,मैं जानता ही नही था की मुसलमान क्या होता है।
    मैंने मुसलमान के बारे में 9/11 अटैक के बाद पता चला। मुझे याद है उस वक़्त मैं थोड़ा छोटा था और मुसलमान कौन होतें है, उसकी जानकारी मुझे नही थी। मेरे एक दोस्त ने टी.वी. देख कर बताया की आतंकवादियों ने अमेरिका में जंग घोषित कर दी है। क्योंकि मैंने कभी भी आतंकवादियों के बारे में नही सुना था तो मैंने न्यूज़ में देखा की वह सब अफ़ग़ानिस्तान से मदद ले रहे थे।मुझे यह लगा की मुसलमान ही आतंकवादी होते हैं, वही लोग सब जगह डर फैलाते रहते हैं। मीडिया भी इस्लाम को हमेशा ऐसे ही दिखा रही थी। तो मेरे मन में इस्लाम को लेकर बहुत घृणापैदा हो गई। मैंने तो आर्मी भी ज्वाइन करने की कोशिश किया, जिससे की मैं जितने हो सके मुसलमानो को मार सकूँ। मैं अपने देश और अपने परिवार के लिए कुछ थोड़ा बहुत करना चाहता था।मेरा ऐसा सोचना था की मुसलमान एक बड़ी बुराई है, दुनिया के लिए। जब मैं आखरी बार आर्मी मेंअप्लाई करने जा रहा था तो मैंने रेडियो पर सुना की वह नबी (सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम) केबारे में बता रहे थे। तो वह बात सुनकर मुझको इस्लाम के बारे में जानने की इच्छा हुई।उस समय मैं बुतपरस्ती के बारे में पढ़ रहा था।तो मैंने बुतपरस्ती के धर्म पर चलने की सोची पर मेरे एक दोस्त ने कहा की तुम्हे पहले और अच्छे से तहकीकात कर लेनी चाहिए।
    फिर मेरा एक दोस्त मिला उसने मुझे कई मुसलमानो से मिलाया तो उसको देख कर मैंने सोचा की कैसे येकिसी मुसलमान के साथ रह सकता है। एक बार उन मुसलमान दोस्तों की बात सुनकर मैंने अपने कॉलेज में क़ुरआन उठाया और मुझे ऐसा लग रहा थाजैसे मैं कोई आतंकवाद की किताब उठा रहा हूँ। मुझे बहुत डर लग रहा था की कही कोई मुझे देख कर ये न समझे की मैं मुसलमान हूँ।फिर मैंने क़ुरआन को उठाया और जब उसको पढ़ा तो मैं बिलकुल हैरान हो गया था। और फिर फ़ौरन पढ़ने के बाद, क़ुरआन जैसे मेरे दिल पर लगा हो। मैं पढ़ते हुए रुकना नही चाह रहा था। मुझे क़ुरआन पढ़ते समय बहुत अच्छा महसूस हो रहा था, और ऐसा इसलिए था क्योंकि जब मैं क़ुरआन पढ़ रहाथा तो मुझे मेरे सब सवालों के जवाब मिल गए थे। वह क़ुरआन की आयते जिनको मैं पढ़ रहा था वो मेरे दिल की गहराई में समाती जा रही थी। मैं उसको पढता ही जा रहा था।मैंने तब जाना की इस्लाम धर्म क्या है। उसके बाद मैं सबसे पहले मैं मस्जिद गया और मैं पूरा दिन वहीं पढता रहा। फिर जब शाम हुई तो मेरी माँ ने मुझको कॉल किया और जब मैं घर गया तो उन्होंने मुझसे पुछा की सारा दिन तुम कहा थे। मैंने कहा की मैं मस्जिद में था। तो उन्होंने कहा क्या? नहीं नही नही, तुम मस्जिदनही जा सकते तुम ईसाई हो। और ईसाई मस्जिद नही जाते।वह बहुत हैरान थी। वह बहुत रोने लगीं और वह मुझे समझाने लगी और लोगों ने भी मुझको समझाया पर मैंने कहा की मैं अब सही रास्ता जान चूका हूँ और मैं अब इस रास्ते पर से नही भटकने वाला हूँ।पता नही इस्लाम में ऐसा क्या है की इस्लाम में आने के बाद मैं बहुत सुकून सा महसूस करताहूँ।अब मैं इस्लाम की सच्चाई जान चुका हूँ और मैंने यह जाना की इस्लाम वह नही जो मीडियादिखाती है और दुनिया जानती है।मैं किसी भी ऐसे इंसान को यह सलाह देना चाहूंगा की अगर आप इस्लाम में आने की सोच रहें हैं या इस्लाम को जानना चाहते हैं तो कृपा कर के किसी मस्जिद में जाकर, किसी जानकार इमाम से इस्लाम के बारे में पूछें, इंटनेट पर न देखें।हाँ, मैं मानता हूँ की इन्टरनेट पर भी बहुत सीबातें होती हैं। पर इन्टरनेट पर हम और आप डालते हैं किसी बात को। पर मस्जिद में इमाम आपको क़ुरआन और हदीस से समझेंगे।आपको बहुत से डराने वाले मिलेंगे पर अगर आपका ईमान मज़बूत है तो आप इस्लाम को अच्छे सेपहचान सकते हैं। मैं भी यही सोचता था की मेरेपरिवार वाले क्या सोचेंगे पर एक बात जान लीजिये की इस्लाम हम इंसान के लिए ही बना है और इस्लाम एक सुलझा हुआ मज़हब है।

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